भावार्थ:- भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में पूर्ण मन से लीन रहने वाले, अन्य आकर्षणों से विरक्त रहने वाले, लौकिक और पारलौकिक चर्चाओं से दूर रहने वाले, श्रवण की इच्छा रखने वाले श्रोताओं में प्रमुख हैं।(१)
विक्लिन्नमनसो ये तु भगवत्स्मृतिविह्वलाः।
अर्थेकनिष्ठास्ते चापि मध्यमाः श्रवणोत्सुकाः॥(२)
भावार्थ:- भगवान श्रीकृष्ण को आंशिक रूप से याद करने वाले, उनके स्मरण में भाव-विभोर होने वाले और किसी प्रयोजन (मोक्ष आदि) के लिए भक्ति करने वाले, श्रवण की इच्छा रखने वाले श्रोताओं में मध्यम कहे गए हैं।(२)
निःसंदिग्धं कृष्णतत्त्वं सर्वभावेन ये विदुः।
ते त्वावेशात्तु विकला निरोधाद्वा न चान्यथा॥(३)
भावार्थ:- जो बिना किसी संशय के भगवान श्रीकृष्ण को सब प्रकार से तत्त्वतः जानते हैं, जो तत्त्व के आवेश और निरोध से विकल हो जाते हैं पर अन्य प्रकार से नहीं।(३)
पूर्णभावेन पूर्णाथाः कदाचित् तु सर्वदा।
अन्यासक्तास्तु ये केचिदधमाः परिकीर्तिताः॥(४)
भावार्थ:- जो कभी-कभी ही पूर्ण भाव से भगवान श्रीकृष्ण को सब प्रकार से जानते हैं और प्रायः अन्यत्र ही आसक्त रहते हैं, उनको निम्न कोटि का श्रोता कहा गया है।(४)
अनन्यमनसो मर्त्या उत्तमाः श्रवणादिषु।
देशकालद्रव्यकर्तृ-मन्त्रकर्मप्रकारतः॥(५)
भावार्थ:- स्थान, समय, वस्तु, कर्ता, मंत्र और कर्म के भाव से असक्त, अनन्य मन से भगवान श्रीकृष्ण के बारे में सुनने वाले मनुष्य उत्तम कहे गए हैं।(५)
भावार्थ:- गोकुल में श्रीकृष्ण से वियोग होने पर यशोदा जी, नन्द जी और गोप-गोपियों को जैसा दुःख हुआ था, वैसा ही दुःख मुझको भी प्राप्त हो जाये।(१)
गोकुले गोपिकानां च सर्वेषां व्रजवासिनाम्।
यत्सुखं समभूत्तन्मे भगवान् किं विधास्यति॥(२)
भावार्थ:- गोकुल में जो सुख गोपियों को और समस्त बृजवासियों को श्रीकृष्ण के संयोग से हुआ था, वह सुख हे श्रीकृष्ण मुझे कैसे प्राप्त होगा?(२)
उद्धवगमने जात उत्सवः सुमहान्यथा।
वृन्दावने गोकुले वा तथा मे मनसि क्वचित्॥(३)
भावार्थ:- जिस प्रकार का सुन्दर और महान उत्सव वृन्दावन और गोकुल में उद्धव के आने से हुआ था, उसी प्रकार का मेरे मन में भी उत्पन्न हो जाये।(३)
महतां कृपया यावद् भगवान् दययिष्यति।
तावदानन्दसन्दोहः कीर्त्यमानः सुखाय हि॥(४)
भावार्थ:- जब श्रीकृष्ण महान सन्तों की कृपा प्रदान करेंगे, तभी उनके द्वारा प्राप्त श्रीकृष्ण का आनन्द रूपी कीर्तन ही सुख का कारण होगा।(४)
महतां कृपया यद्वत् कीर्तनं सुखदं सदा।
न तथा लौकिकानां तु स्निग्धभोजनरूक्षवत्॥(५)
भावार्थ:- जैसा महान संतो की कृपा से प्राप्त श्रीकृष्ण का कीर्तन सुख देने वाला होता है वैसा सांसारिक लोगों द्वारा किया हुआ कीर्तन नहीं होता है, दोनों का अन्तर रसमय और नीरसमय भोजन के समान होता है।(५)
गुणगाने सुखावाप्ति-र्गोविन्दस्य प्रजायते।
यथा तथा शुकादीनां नैवात्मनि कुतोsन्यतः॥(६)
भावार्थ:- शुकदेव आदि भक्तों के द्वारा गोविन्द कीर्तन के संयोग से जो सुख प्राप्त होता है वैसा तो आत्म ज्ञान से भी संभव नहीं होता है, इस प्रकार के सुख की प्राप्ति अन्य कहीं भी नहीं हो सकती है।(६)
भावार्थ:- जब लोगों के इस प्रकार के दुःख को देख कर श्रीकृष्ण द्रवित हो जाते हैं, तब सबके ह्रदय में रहने वाले वह सनातन आनंद स्वरुप श्रीकृष्ण बाहर प्रकट हो जाते हैं।(७)
भावार्थ:- यद्यपि श्रीकृष्ण सनातन आनंद स्वरुप हैं पर उनकी कृपा रूपी आनंद की प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है, समस्त हृदयों में रहने वाले श्रीकृष्ण अपने गुणों का कीर्तन सुनकर अपने भक्तों को परम-आनंद से सराबोर कर देते हैं।(८)
तस्मात्सर्वं परित्यज्य निरुद्धैः सर्वदा गुणाः।
सदानन्दपरैर्गेयाः सच्चिदानन्दता ततः॥(९)
भावार्थ:- इसलिए समस्त सांसारिक विषयों का चिंतन छोड़कर केवल सत्य, चेतन और आनंद स्वरुप श्री कृष्ण का ही सदैव गुणगान करना चाहिये।(९)
अहं निरुद्धो रोधेन निरोधपदवीं गतः।
निरुद्धानां तु रोधायः निरोधं वर्णयामि ते॥(१०)
भावार्थ:- मैं सांसारिक विषयों के चिंतन से मुक्त होकर वास्तविक निरोध पद को प्राप्त हुआ हूँ, अब मैं निरोध पद को प्राप्त करने वाले जिज्ञासुओं के लिए उसका वर्णन करता हूँ।(१०)
हरिणा ये विनिर्मुक्तास्ते मग्ना भवसागरे।
ये निरुद्धास्त एवात्र मोदमायान्त्यहर्निशम्॥(११)
भावार्थ:- जो जीव श्रीहरि से विमुख रहते हैं, वह भव-सागर में ही निमग्न रहते हैं और जो जीव श्रीहरि के सम्मुख रहते हैं, वह इन्द्रियों के संयम से रात और दिन सदैव आनंद को प्राप्त होते हैं।(११)
संसारावेशदुष्टानामि-न्द्रियाणां हिताय वै।
कृष्णस्य सर्ववस्तूनि भूम्न ईशस्य योजयेत्॥(१२)
भावार्थ:- सांसारिक आसक्ति में प्रवृत दुष्ट इन्द्रियों का उपयोग समस्त सांसारिक वस्तुओं को श्रीकृष्ण का स्वरूप समझकर ही भगवान के लिये ही उपयोग करना चाहिये।(१२)
गुणेष्वाविष्टचित्तानां सर्वदा मुरवैरिणः।
संसारविरहक्लेशौ न स्यातां हरिवत्सुखम्॥(१३)
भावार्थ:- प्रकृति के गुणों में आसक्त मन को सदैव श्रीमुरारी में लगाने से सांसारिक आसक्ति के त्याग से दुःख न होकर श्रीकृष्ण दर्शन के समान सुख की प्राप्ति होती है।(१३)
तदा भवेद्दयालुत्व-मन्यथा क्रूरता मता।
बाधशंकापि नास्त्यत्र तदध्यासोsपि सिद्धयति॥(१४)
भावार्थ:- ऎसा करने से प्रभु की कृपा प्राप्त होती है अन्यथा क्रोध रूपी विकार ही उत्पन्न होता है, ऎसा करने से किसी प्रकार के व्यवधान की आशंका भी नहीं होती है और संसार के सारहीनता का अनुभव भी सिद्ध हो जाता है।(१४)
भगवद्धर्म सामर्थ्या-द्विरागो विषये स्थिरः।
गुणैहरेः सुखस्पर्शान्न दुःखं भाति कर्हिचित्॥(१५)
भावार्थ:- भागवत धर्म की शक्ति से सांसारिक विषयों के प्रति वैराग्य स्वतः ही हो जाता है, और समस्त प्राकृतिक गुणों से मुक्त होकर श्रीकृष्ण नाम के सुख के स्पर्श से दुःख का तनिक भी आभास नहीं होता है।(१५)
एवं ज्ञात्वा ज्ञानमार्गा-दुत्कर्षं गुणवर्णने।
अमत्सरैरलुब्धैश्च वर्णनीयाः सदा गुणाः॥(१६)
भावार्थ:- इस प्रकार श्रीहरि गुणगान को ज्ञान मार्ग से उत्कृष्ट जानकर, ईर्ष्या और लोभ को छोड़कर सदा श्रीकृष्ण के गुणों का ही वर्णन करना चाहिये।(१६)
हरिमूर्तिः सदा ध्येया संकल्पादपि तत्र हि।
दर्शनं स्पर्शनं स्पष्टं तथाकृतिगती सदा॥(१७)
भावार्थ:- श्रीहरि की मूर्ति का ध्यान सदैव करना चाहिए और सदैव भगवान के साक्षात् दर्शन और स्पर्श प्राप्ति के संकल्प के साथ ही समस्त कार्य करने चाहिये।(१७)
श्रवणं कीर्तनं स्पष्टं पुत्रे कृष्णप्रिये रतिः।
पायोर्मलांशत्यागेन शेषभागं तनौ नयेत्॥(१८)
भावार्थ:- श्रीकृष्ण के बारे में सुनते और कीर्तन करते हुये पत्नी, पुत्र इत्यादि से उसी प्रकार से निर्लिप्त होकर प्रेम करना चाहिये, जिस प्रकार वायु इन्द्रियों द्वारा मल-मूत्र त्याग के पश्चात शरीर में ही रहती है।(१८)
यस्य वा भगवत्कार्य यदा स्पष्टं न दृश्यते।
तदा विनिग्रहस्तस्य कर्तव्य इति निश्चयः॥(१९)
भावार्थ:- जो कार्य पूर्ण रूप से भगवान सेवा से सम्बंधित प्रतीत न हो उस कार्य को न करना ही कर्त्तव्य होता है, यही एकमात्र सिद्धांत है।(१९)
नातः परतरो मन्त्रो नातः परतरः स्तवः।
नातः परतरा विद्या तीर्थं नातः परात्परम्॥(२०)
भावार्थ:- इससे बढ़कर न तो कोई मंत्र है, इससे बढ़कर न कोई स्तुति है, इससे बढ़कर न कोई विद्या है और न ही इससे बढ़कर कोई तीर्थ है, अतः यही सिद्धांत ही सर्वश्रेष्ठ है।(२०)
भावार्थ:- किसी भी प्रकार की चिंता न करते हुए पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में स्वयं को समर्पित कर देना चाहिये और विश्वास रखना चाहिये कि भगवान अपनी भक्ति और सांसारिक व्यवहार दोनों की सदैव रक्षा करेंगे।(१)
निवेदनं तु स्मर्तव्यं सर्वथा ताह्शैर्जनैः।
सर्वेश्चरश्च सर्वात्मा निजेच्छातः करिष्यति॥(२)
भावार्थ:- सदैव समर्पण की भावना में स्थित रहकर भगवान का स्मरण करना चाहिये और यही समझना चाहिये कि सभी के आत्म-स्वरूप भगवान अपनी इच्छा के अनुसार ही सब कुछ करेंगे।(२)
सर्वेषां प्रभु संबंधो न प्रत्येकमिति स्थितिः।
अतोsन्यविनियोगेsपि चिन्ता का स्वस्य सोsपिचेत्॥(३)
भावार्थ:- भगवान के साथ सभी सम्पूर्ण जगत का संबन्ध है लेकिन हर कोई भगवान की भक्ति में निरन्तर स्थिर नहीं रहता है, अतः अन्य किसी को भगवान की भक्ति में स्थिर न देखकर चिंतित नहीं होना चाहिये क्योंकि उनको भगवान स्वयं ही देख रहें हैं।(३)
अज्ञानादथ वा ज्ञानात् कृतमात्मनिवेदनम्।
यैः कृष्णसात्कृतप्राणैस्-तेषां का परिवेदना॥(४)
भावार्थ:- जिन्होंने अज्ञानता से या ज्ञान पूर्वक भगवान के प्रति आत्म-समर्पण कर दिया है और अपने जीवन को भगवान श्रीकृष्ण के अधीन कर दिया है ऎसे भक्त कभी दुखी नहीं हो सकते हैं।(४)
तथा निवेदने चिन्ता त्याज्या श्रीपुरुषोत्तमे।
विनियोगेsपि सा त्याज्या समर्थो हि हरिः स्वतः॥(५)
भावार्थ:- इसलिये समस्त चिंताओं से मुक्त होकर पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित हो जाना चाहिये, पूर्ण समर्पण न होने पर भी चिंताओं का त्याग कर देना चाहिये क्योंकि भगवान श्रीहरि स्वयं ही सभी प्रकार समर्थ हैं।(५)
लोके स्वास्थ्यं तथा वेदे हरिस्तु न करिष्यति।
पुष्टिमार्गस्थितो यस्मात्-साक्षिणो भवताsखिलाः॥(६)
भावार्थ:- पुष्टि मार्ग में स्थित भक्त को संसार, स्वास्थ्य और वेद पालन की भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि सम्पूर्ण जगत के साक्षी भगवान श्रीहरि भक्तों सदैव रक्षा करते हैं।(६)
सेवाकृतिर्गुरोराज्ञा-बाधनं वा हरीच्छया।
अतः सेवा परं चित्तं विधाय स्थीयतां सुखम्॥(७)
भावार्थ:- गुरु की आज्ञा को ही श्रीहरि की इच्छा मानकर कर्तव्य पालन ही सच्ची प्रभु-सेवा है, अतः परमात्मा की सेवा में ही मन को स्थिर करके ही सुख की अनुभूति करनी चाहिये।(७)
चित्तोद्वेगं विधायापि हरिर्यद्यत् करिष्यति।
तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिन्तां द्रुतं त्यजेत॥(८)
भावार्थ:- मन की व्याकुलता पर संयम रखकर यही समझना चाहिये कि भगवान जो करेंगे अच्छा ही करेंगे, और जो कुछ भी हो रहा है उसे श्रीहरि की लीला समझकर समस्त चिंताओं का शीघ्र ही त्याग कर देना चाहिये।(८)
तस्मात्सर्वात्मना नित्यं श्रीकृष्णः शरणं मम।
वदद्भिरेव सततं स्थेयमि-त्येव मे मतिः॥(९)
भावार्थ:- जो सभी की आत्मा है मैं सदैव उन भगवान श्रीकृष्ण की शरण में हूँ, निरन्तर इसप्रकार का जप करते रहना चाहिये ऎसा मेरा निश्चित मत है।(९)
भावार्थ:- श्री भगवान कहते हैं - सृष्टि के आरम्भ होने से पहले केवल मैं ही था, सत्य भी मैं था और असत्य भी मैं था, मेरे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं था। सृष्टि का अन्त होने के बाद भी केवल मैं ही रहता हूँ, यह चर-अचर सृष्टि स्वरूप केवल मैं हूँ और जो कुछ इस सृष्टि में दिव्य रूप से स्थिति है वह भी मैं हूँ, प्रलय होने के बाद जो कुछ बचा रहता है वह भी मै ही होता हूँ।(१)
ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥(२)
भावार्थ:- मूल तत्त्व आत्मा जो कि दिखलाई नहीं देती है, इसके अलावा सत्य जैसा जो कुछ भी प्रतीत देता है वह सभी माया है, आत्मा के अतिरिक्त जिसका भी आभास होता है वह अन्धकार और परछांई के समान मिथ्या है।(२)
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु।
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥(३)
भावार्थ:- जिसप्रकार पंच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) संसार की छोटी या बड़ी सभी वस्तुओं में स्थित होते हुए भी उनसे अलग रहते हैं, उसी प्रकार मैं आत्म स्वरूप में सभी में स्थित होते हुए भी सभी से अलग रहता हूँ।(३)
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा॥(४)
भावार्थ:- आत्म-तत्त्व को जानने की इच्छा रखने वालों के लिए केवल इतना ही जानने योग्य है कि सृष्टि के आरम्भ से सृष्टि के अन्त तक तीनों लोक (स्वर्गलोक, मृत्युलोक, नरकलोक) और तीनों काल (भूतकाल, वर्तमानकाल, भविष्यकाल) में सदैव एक समान रहता है, वही आत्म-तत्त्व है।(४)
भावार्थ:- हे मेरे अन्तःकरण! मेरे शब्दों को सावधान होकर सुन, इस संसार में वास्तव में श्रीकृष्ण से बढ़कर अन्य कोई दोष-रहित देवता नहीं है। (१)
चाण्डाली चेद्राजपत्नी जाता राज्ञा च मानिता।
कदाचिदपमानेऽपि मूलतः का क्षतिर्भवेत्॥ (२)
भावार्थ:- जिसप्रकार रानी से सम्मानित नीच जाति की स्त्री का यदि राजा के द्वारा कभी अपमान हो जाता है तो वास्तविकता में उस स्त्री की कोई हानि नहीं होती है।। (२)
समर्पणादहं पूर्वमुत्तमः किं सदा स्थितः।
का ममाधमता भाव्या पश्चात्तापो यतो भवेत्॥ (३)
भावार्थ:- उसीप्रकार भगवान के शरणागत होने से पहले क्या सदैव इस अवस्था में स्थित था? तो फिर अपनी अधमता का क्या विचार करना जिससे पश्चात्ताप हो। (३)
सत्यसंकल्पतो विष्णु-र्नान्यथा तु करिष्यति।
आज्ञैव कार्या सततं स्वामिद्रोहोऽन्यथा भवेत्॥ (४)
भावार्थ:- सत्य संकल्पित भगवान श्रीविष्णु निश्चय ही कुछ भी गलत नहीं करेंगे, इसलिये निरंतर उनकी आज्ञा का पालन करना ही कर्त्तव्य है, इसके विपरीत कुछ भी करना भगवान से द्रोह होगा। (४)
सेवकस्य तु धर्मोऽयं स्वामी स्वस्य करिष्यति।
आज्ञा पूर्व तु या जाता गंगासागरसंगमे॥ (५)
भावार्थ:- सेवक का यही एकमात्र धर्म है, बाकी तो स्वामी स्वयं ही करेंगे, जैसा कि पूर्व में गंगासागर के तट पर जो आज्ञा हुई थी। (५)
यापि पश्चान्मधुवने न कृतं तद्द्वयं मया।
देहदेशपरित्यागः तृतीयो लोकगोचरः॥ (६)
भावार्थ:- वही आज्ञा बाद में मधुवन में भी हुई थी जिसका मेरे द्वारा पालन नहीं हुआ था, वह शरीर, स्थान और आँखो से दिखाई देने वाले संसार की आसक्ति का त्याग करने की थी। (६)
पश्चात्तापः कथं तत्र सेवकोऽहं न चान्यथा।
लौकिकप्रभुवत्कृष्णो न द्रष्टव्यः कदाचन॥ (७)
भावार्थ:- इसका भी पश्चात्ताप क्या करना, भगवान के सेवक के अतिरिक्त मैं कुछ भी नहीं हूँ, भगवान श्रीकृष्ण को कभी भी सांसारिक दृष्टि से न देखना। (७)
भावार्थ:- सब कुछ प्रभु को समर्पित करके भक्ति-भाव से कृतार्थ होकर सुखी हो जा, जिसप्रकार माता-पिता कन्या के वयस्क होने के बाद स्नेह-पूर्वक उसको उसके पति को सोंपकर सुखी हो जाते हैं। (८)
भावार्थ:- शरीर के कर्तव्यों के साथ ऎसा नहीं करना चाहिये अन्यथा प्रभु प्रसन्न नही होंगे, सोच समझकर यह तो विचार कर कि ऎसी स्थिति में संसार की अवस्था क्या होगी। (९)
अशक्ये हरिरेवास्ति मोहं मा गाः कथंचन।
इति श्रीकृष्णस्यदासस्य वल्लभस्य हितं वचः।
चित्तं प्रति यदाकर्ण्य भक्तो निश्चिन्ततां व्रजेत्॥ (१०)
भावार्थ:- आशंकाओं और मोह से मुक्त केवल हरि की ही भक्ति में स्थित भगवान श्रीकृष्ण के सेवक वल्लभ के इन कल्याणकारी वचनों को मन में धारण करके समस्त भक्त चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं। (१०)
भावार्थ : श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की महारात्रि के समय स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मुझसे जो बचन कहे गए हैं उन बचनों को मैं उसी प्रकार से कहता हूँ। (१)
भावार्थ : मुझ ईश्वर से किसी भी रूप में अपना सम्बन्ध जोड़ने से समस्त शरीरधारी प्राणी सभी प्रकार के दोषों से मुक्त हो जाते हैं, जो कि स्मृतियों में पाँच प्रकार के कहे गये हैं। (२)
सहजा देशकालोत्था लोकवेदनिरूपिताः।
संयोगजाः स्पर्शजाश्च न मन्तव्याः कथन्चन॥ (३)
भावार्थ : सामान्य रूप से देश के लिये, समय के अनुसार, सामाजिक मान्यता के अनुसार, वेदों में वर्णित यज्ञ द्वारा, और संयोगवश स्पर्श से होने वाले कोई भी कार्यों को अपने द्वारा न मानते हुए कार्य करते रहना चाहिये। (३)
अन्यथा सर्वदोषाणां न निवृत्तिः कथन्चन।
असमर्पितवस्तुनां तस्माद्वर्जनमाचरेत्॥ (४)
भावार्थ : अन्य किसी प्रकार से समस्त दोषों का निवारण संभव नहीं है, इसलिए जो वस्तु मुझको समर्पित नहीं की जाती है, उस वस्तु का किसी भी अवस्था में स्वीकार नहीं करनी चाहिये। (४)
भावार्थ : निवेदन करते हुए समस्त वस्तुओं को सभी स्थिति में मुझको ही समर्पित करनी चाहिए, अन्य देवी या देवताओं को अर्पित की गयी वस्तु को मुझे कभी समर्पित नहीं करनी चाहिये। (५)
तस्मादादौ सर्वकार्ये सर्ववस्तु समर्पणम्।
दत्तापहारवचनं तथा च सकलं हरेः॥ (६)
भावार्थ : इस प्रकार सभी कार्यों के प्रारंभ में ही समस्त कार्यों को मुझे समर्पित कर देनी चाहिये, मन से, वाणी से और शरीर द्वारा किये गये सभी कार्य श्रीहरि के लिये ही होने चाहिये। (६)
न ग्राह्ममिति वाक्यं हि भिन्नमार्गपरं मतम्।
सेवकानां यथालोके व्यवहारः प्रसिध्यति॥ (७)
भावार्थ : मेरे द्वारा कहे गये शब्दों के अतिरिक्त अन्य किसी भी मार्ग का अनुसरण नहीं करना चाहिये, भक्तों का जो आचरण संसार में विख्यात है उसी का ही अनुसरण करना चाहिये। (७)
भावार्थ : इस प्रकार प्राणी समस्त कार्यों को मुझे समर्पित करके परमब्रह्म परमात्मा के समान पवित्र हो जाते हैं, जिस प्रकार गंगा में मिलकर सभी प्रकार के अपवित्र जल गंगा के समान पवित्र हो जाते हैं, गंगा के निरुपण के अनुसार ही इसे समझना चाहिये। (८)
भावार्थ : जिस विधि से भक्ति वृद्धि को प्राप्त होती है, उस विधि का निरूपण किया जाता है, सांसारिक आसक्ति के त्याग से, कृष्ण कथा सुनने से और कृष्ण नाम के कीर्तन से ही भक्ति रूपी बीज दृढ़ स्थित होता है। (१)
भावार्थ : घर में रहकर ही अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करते हुए ही भक्ति का बीज दृढ़ होता है, सांसारिक इच्छाओं को सीमित कर मन को स्थिर करके मूर्ति पूजा के द्वारा, कथा श्रवण आदि विधियों से भगवान श्रीकृष्ण का भजन करना चाहिये। (२)
व्यावृतोपि हरौ चित्तं श्रवणादौ यतेत्सदा।
ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत्॥ (३)
भावार्थ : सांसारिक इच्छाओं के होते हुए भी चित्त को श्रीहरि के श्रवण आदि में प्रयत्न करके निरन्तर लगाये रखना चाहिए, और तब तक लगाये रखना चाहिये जब तक भगवान से प्रेम तथा आसक्ति और राग उत्पन्न न हो जाये। (३)
भावार्थ : शास्त्रों के अनुसार भक्ति के बीज को तभी दृढ़ स्थित कहा जा सकता है जब-तक अन्य किसी के प्रति प्रेम और आसक्ति नहीं रह जाती है और घर के प्रति स्वत: ही आसक्ति का अन्त नहीं हो जाता है। (४)
भावार्थ : इस प्रकार भक्ति के प्राप्त होने पर भी सदैव घर में निवास करने से भक्ति के विनाश हो जाता है, इसलिए घर का त्याग करके मन को भगवान की भक्ति में स्थिर करने का प्रयत्न करना चाहिये। (६)
भावार्थ : इस प्रकार निरन्तर प्रयत्न करने से सम्पूर्ण रूप से शुद्ध-भक्ति में स्थिरता प्राप्त हो जाती है, घर त्याग करने में दुष्ट लोगों की संगति और भोजन प्रमुख बाधाएँ होती हैं। (७)
अतस्थेयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परेः।
अदूरे विप्रकर्षे वा यथा चित्तं न दुष्यति॥ (८)
भावार्थ : इसलिए भगवान के मंदिर के समीप तथा भक्तों के साथ निवास करना चाहिये, भक्तों के पास रहें या भक्तों से दूर रहें लेकिन इस प्रकार रहना चाहिये जिससे मन दूषित न हो सके। (८)
सेवायां वा कथायां वा यस्यासक्तिर्दृढ़ा भवेत्।
यावज्जीवं तस्य नाशो न क्वापीति मतिर्मम॥ (९)
भावार्थ : भगवान की सेवा करने से या भगवान की कथा श्रवण करने से जिस प्रकार से भी भगवान के प्रति आसक्ति दृड़ हो सके, इस प्रकार जीवन की अन्तिम श्वांस तक सेवा या श्रवण करते रहना चाहिए, ऐसा श्रीवल्लभाचार्य जी का कथन है। (९)
भावार्थ : किसी बाधा की संभावना से एकान्त में रहने की इच्छा नहीं करनी चाहिये बल्कि भय मुक्त होकर एकान्त में रहना चाहिये, क्योंकि भगवान श्रीहरि निश्चित रूप से सभी प्रकार से रक्षा करते हैं, इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नहीं करना चाहिये। (१०)
भावार्थ : इस प्रकार भगवत प्राप्ति की इच्छा वालों के लिये शास्त्रों के गूढ़ तत्त्व का निरूपण किया गया है, जो भी इस विधि का दृड़ता-पूर्वक पालन करता है, वह भगवान में दृढ़ स्थित हो ही जाता है। (११)
भावार्थ : प्रत्येक क्षण सम्पूर्ण मन-भाव से ब्रज के अधिपति भगवान श्रीकृष्ण का ही स्मरण करना चाहिए, मनुष्य के लिए इसके अतिरिक्त और कुछ भी कर्म नहीं है, केवल यही एक मात्र धर्म है। (१)
एवं सदा स्वकर्तव्यं स्वयमेव करिष्यति।
प्रभुः सर्व समर्थो हि ततो निश्चिन्ततां व्रजेत् (२)
भावार्थ : भगवान ही सर्वशक्तिमान हैं, इस बात को ध्यान में रखते हुए चिन्ता मुक्त होकर सदैव अपने कर्तव्यों का ही पालन करते रहना चाहिए, । (२)
यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि।
ततः किमपरं ब्रूहि लोकिकैर्वैदिकैरपि॥ (३)
भावार्थ : सभी के आत्म-स्वरुप गोकुल के राजा भगवान श्रीकृष्ण को यदि आपने अपने ह्रदय में धारण किया हुआ है तो इससे बढ़कर अन्य कोई सांसारिक और वैदिक कार्य नहीं हो सकते हैं। (३)
अतः सर्वात्मना शश्ववतगोकुलेश्वर पादयोः।
स्मरणं भजनं चापि न त्याज्यमिति मे मतिः॥ (४)
भावार्थ : इसी कारण सभी के आत्म-स्वरुप गोकुल के अविनाशी ईश्वर श्रीकृष्ण के चरणों का स्मरण और भजन कभी नहीं छोड़ना चाहिए, ऐसा श्रीवल्लभाचार्य जी का कथन है। (४)
ते धन्या भुवि परमार्थनिश्चितेहाः, शेषास्तु भ्रमनिलये परिभ्रमंतः॥ (१)
भावार्थ : ज्ञान वही होता है, जिससे इन्द्रियों की चंचलता शांत होती है, जानने योग्य वही होता है जिसका अर्थ उपनिषदों द्वारा सुनिश्चित किया गया है। जिन लोगों का इस पृथ्वी पर परमार्थ ही एक मात्र निश्चित उद्देश्य होता है, वही ईश्वर के कृपा-पात्र होते हैं, बाकी लोग तो इस मोह रूपी संसार में भ्रमित होकर घूमते ही रहते हैं। (१)
भावार्थ : जो लोग मोह, राग, द्वेष आदि शत्रुओं और विषयों की इच्छा को आरंभ में ही जीत कर योग साधना में प्रवृत्त हो जाते हैं। जो लोग ज्ञान के द्वारा ब्रह्म का अनुभव करके आत्म-विद्या रूपी पत्नी के साथ एकान्त रूपी घर में शान्ति-पूर्वक रहते हैं, वही ईश्वर के कृपा-पात्र होते हैं। (२)
भावार्थ : जो लोग अधो-गति का मूल कारण घर की आसक्ति को छोड़कर स्वयं को जानने के लिए उपनिषदों का वास्तविक अर्थ रूपी रस पीते हैं। जो लोग सभी विषय भोगों की आसक्ति और सभी प्रकार के पद की कामनाओं से विरक्त होते हैं, ऎसे विरक्त भाव वाले लोग एकांत में रहने वाले विरक्त संतों की संगति करते है, वही ईश्वर के कृपा-पात्र होते हैं। (३)
भावार्थ :जो लोग 'मैं' और 'मेरा' इन दो बांधने वाले महान पदों का त्याग करके मान और अपमान में समान रहकर सभी को समान दृष्टि से देखते हैं। जो लोग आत्मा को ही एक मात्र कर्ता समझकर सभी कर्म-फलों को परमात्मा को अर्पित करते हैं, वही ईश्वर के कृपा-पात्र होते हैं। (४)
भावार्थ : जो लोग पुत्र-सुख, वित्त-सुख और लोक-सुख तीनों प्रकार की कामनाओं का त्याग करके मोक्ष के मार्ग की खोज करते हैं, और जो भिक्षा रूपी अमृत पर ही आश्रित होकर शरीर की यात्रा पूर्ण करते हैं। जो लोग आत्मा से भी परे परमात्मा के ज्ञान प्रकाश को हृदय में देखते हैं, वही ईश्वर के कृपा-पात्र होते हैं। (५)
नासन्न सन्न सदसन्न महन्न चाणु, न स्त्री पुमान्न च नपुंसकमेक बीजम्।
यैर्ब्रह्म तत्समनुपासितमेक चितैः, धन्या विरेजुरितरे भवपाश बद्धाः॥ (६)
भावार्थ : जो न तो सत्य है, न ही असत्य है, न विशाल है, न सूक्ष्म है, न स्त्री है, न पुरुष है, और न नपुंसक ही है, जो लोग इन सभी के मूल कारण रूप ब्रह्म की एकाग्र चित्त होकर उपासना करते हैं, वही ईश्वर के कृपा-पात्र होते हैं, अन्य लोग तो जन्म-मृत्यु रूपी भवपाश के बन्धन जकड़े रहते हैं। (६)
भावार्थ : जो लोग अज्ञान रूपी दलदल में न फंसकर, महत्वहीन दुखों की खान, जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था वाले संसार मे आसक्त नहीं होते हैं। ऎसे संसार रूपी बंधन को अनित्य समझकर ज्ञान रूपी तलवार से काटने का निश्चय करते हैं, वही ईश्वर के कृपा-पात्र होते हैं। (७)
भावार्थ : जो लोग शांत-चित्त से, स्थिर-बुद्धि से, मधुर-स्वभाव से और मन से दृड़ संकल्प के साथ मोहग्रस्त नही होते हैं। जो लोग एकान्त में रहकर निरन्तर ब्रह्म विचारों में लीन आत्म पद पर स्थित रहते हैं, वही ईश्वर के कृपा-पात्र होते हैं। (८)
भावार्थ : वेदों का नियमित अध्ययन करें, उनमें कहे गए कर्मों का पालन करें, उस परम प्रभु के नियमों का पालन करें, व्यर्थ के कर्मों में बुद्धि को न लगायें। समग्र पापों को जला दें, इस संसार के सुखों में छिपे हुए दुखों को देखें, आत्म-ज्ञान के लिए प्रयत्नशील रहें, अपने घर की आसक्ति को शीघ्र त्याग दें। (१)
भावार्थ : सज्जनों का साथ करें, प्रभु में भक्ति को दृढ़ करें, शांति आदि गुणों का सेवन करें, कठोर कर्मों का परित्याग करें, सत्य को जानने वाले विद्वानों की शरण लें, प्रतिदिन उनकी चरण पादुकाओं की पूजा करें, ब्रह्म के एक अक्षर वाले नाम ॐ के अर्थ पर विचार करें, उपनिषदों के महावाक्यों को सुनें। (२)
भावार्थ : वाक्यों के अर्थ पर विचार करें, श्रुति के प्रधान पक्ष का अनुसरण करें, कुतर्कों से दूर रहें, श्रुति पक्ष के तर्कों का विश्लेषण करें, मैं ब्रह्म हूँ ऐसा विचार करते हुए मैं रुपी अभिमान का त्याग करें, मैं शरीर हूँ, इस भाव का त्याग करें, बुद्धिमानों से वाद-विवाद न करें। (३)
भावार्थ : भूख को रोग समझते हुए प्रतिदिन भिक्षा रूपी औषधि का सेवन करें, स्वाद के लिए अन्न की याचना न करें, भाग्यवश जो भी प्राप्त हो उसमें ही संतुष्ट रहें| सर्दी-गर्मी आदि विषमताओं को सहन करें, व्यर्थ वाक्य न बोलें, निरपेक्षता की इच्छा करें, लोगों की कृपा और निष्ठुरता से दूर रहें। (४)
भावार्थ : एकांत के सुख का सेवन करें, परब्रह्म में चित्त को लगायें, परब्रह्म की खोज करें, इस विश्व को उससे व्याप्त देखें, पूर्व कर्मों का नाश करें, मानसिक बल से भविष्य में आने वाले कर्मों का आलिंगन करें, प्रारब्ध का यहाँ ही भोग करके परब्रह्म में स्थित हो जाएँ। (५)
संप्राप्ते सन्निहिते काले, न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे॥ (१)
भावार्थ : हे मोह से ग्रसित बुद्धि वालो! गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि मृत्यु के समय अन्य किसी को याद रखने से आपकी रक्षा नहीं हो सकती है। (१)
भावार्थ : हे मोहग्रस्त बुद्धि वालो! धन एकत्रित करने के लोभ को त्यागो, अपने मन से इन समस्त कामनाओं का त्याग करो, सत्य के मार्ग का अनुसरण करो, अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त हो उसी से ही अपने मन को प्रसन्न रखो। (२)
भावार्थ : स्त्री शरीर सौन्दर्य पर आसक्त होकर मोहग्रस्त न हो, अपने मन में इसका निरंतर स्मरण न करो, यह रक्त, मांस, मज्जा आदि के विकार के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। (३)
नलिनीदलगतजलमतितरलम्, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोक शोकहतं च समस्तम्॥ (४)
भावार्थ : यह जीवन कमल के पत्ते पर पड़ी हुई पानी की बूंद के समान अनिश्चित और पल में नष्ट होने वाला है, यह जान लो कि समस्त जगत रोग, अहंकार और दु:ख में ही डूबा हुआ है। (४)
यावद्वित्तोपार्जनसक्त:, तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥ (५)
भावार्थ : जब तक व्यक्ति धन कमाने में समर्थ है, तभी तक परिवार के सभी लोग उस व्यक्ति के प्रति प्रेम का प्रदर्शन करते हैं परन्तु जब धन कमाने में असमर्थ हो जाता है तो उससे सामान्य बातें भी कोई नहीं पूछता है। (५)
भावार्थ : जब तक व्यक्ति के शरीर में प्राण रहते हैं तब तक ही लोग उससे कुशल पूछते हैं, शरीर से प्राण वायु के निकल जाते ही पत्नी भी उसके शरीर से डरती है। (६)
बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः, परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥ (७)
भावार्थ : बाल अवस्था में खेल में रूचि होती है, युवा अवस्था में युवा स्त्री के प्रति आकर्षण होता है, वृद्धा अवस्था में सभी चिंताओं से घिरे रहतें हैं लेकिन वास्तव में प्रभु से कोई प्रेम नहीं करता है। (७)
का ते कांता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयमतीव विचित्रः।
कस्य त्वं वा कुत अयातः, तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥ (८)
भावार्थ : मेरे भाई! कौन तुम्हारी पत्नी है? कौन तुम्हारा पुत्र है? ये संसार अत्यंत आश्वर्यजनक है, तुम कौन हो? कहाँ से आये हो? इस बात पर तो पहले चिंतन कर लो। (८)
भावार्थ : सत्संग से वैराग्य उत्पन्न होता है, वैराग्य से मोह का त्याग होता है, मोह के त्याग होने पर परम-तत्त्व का ज्ञान होता है और तत्त्व-ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। (९)
भावार्थ : जिस प्रकार पानी के सूख जाने पर तालाब नहीं रहता है, उसी प्रकार आयु बीत जाने के बाद काम-भाव नहीं रहता है, धन चले जाने पर परिवार में प्रेम नहीं रहता है और तत्त्व-ज्ञान हो जाने के बाद संसार नहीं रहता है। (१०)
भावार्थ : धन, शक्ति और यौवन का अभिमान न करो, समय इन सभी को पल भर में नष्ट कर देता है, इस सम्पूर्ण संसार को माया से घिरा हुआ जानकर तुम ब्रह्म पद में प्रवेश करो। (११)
दिनयामिन्यौ सायं प्रातः, शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि, न मुन्च्त्याशावायुः॥ (१२)
भावार्थ : दिन और रात, शाम और सुबह, सर्दी और गर्मी बार-बार आते-जाते रहते है, समय के इस खेल के साथ जीवन नष्ट होता रहता है लेकिन कामनाओं का वायु के समान कभी अंत नहीं होता है। (१२)
भावार्थ : तुम्हें स्त्री और धन की इतनी चिंता क्यों है, क्या उनका कोई नियंत्रण करने वाला नहीं है, तीनों लोकों में केवल सज्जन लोगों की संगति ही इस भवसागर से पार जाने की एक मात्र नौका है। (१३)
जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः, काषायाम्बरबहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः, उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः॥ (१४)
भावार्थ : हे मोह से ग्रसित मनुष्यों तुम इसको देख कर भी क्यों नहीं देख पाते हो कि बड़ी-बड़ी जटा कर लेना, सिर से सभी बालों को हटा लेना, बालों को बिखेर लेना, भगवा वस्त्र धारण कर लेना और अनेकों प्रकार के वेष धारण कर लेना, यह सब तो केवल अपना पेट भरने के लिए ही धारण किये जाते हैं। (१४)
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं, दशनविहीनं जतं तुण्डम्।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं, तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥ (१५)
भावार्थ : शरीर को तपाना, पके हुए बालों का होना, दांतों से रहित मुख का होना और हाथ में दंड लेकर चलने वाला वृद्ध भी आशा-तृष्णा की रस्सी से बंधा रहता है। (१५)
करतलभिक्षस्तरुतलवासः, तदपि न मुञ्चत्याशापाशः॥ (१६)
भावार्थ : सूर्य के छिपने के बाद रात्रि में आग जलाकर या घुटनों में सिर को छिपाकर सर्दी बचाने वाला, हाथ में भिक्षा का अन्न खाने वाला और पेड़ के नीचे रहने वाला भी अपनी कामनाओं के बंधन को नहीं छोड़ पाता है। (१६)
कुरुते गङ्गासागरगमनं, व्रतपरिपालनमथवा दानम्।
ज्ञानविहिनः सर्वमतेन, मुक्तिं न भजति जन्मशतेन॥ (१७)
भावार्थ : किसी भी धर्म के अनुसार बिना ज्ञान के गंगासागर को जाने वाला, व्रत का पालन करने वाला और दान देने वाला भी सौ जन्मों में भी मुक्ति को प्राप्त नहीं हो पाता है। (१७)
सुर मंदिर तरु मूल निवासः, शय्या भूतल मजिनं वासः।
सर्व परिग्रह भोग त्यागः, कस्य सुखं न करोति विरागः॥ (१८)
भावार्थ : देवताओं के मंदिर या पेड़ के नीचे निवास करने वाला, जमीन पर सोने वाला, एकान्त में रहने वाला, सभी सुख-भोगों का त्याग करने वाले वैरागी को भी आनंद की प्राप्ति नहीं होती है। (१८)
भावार्थ : चाहे कोई योग में स्थित रहने वाला हो या विषय भोगों में लिप्त रहने वाला हो, सत्संग करने वाला हो या कुसंग करने वाला हो, लेकिन जिसका मन निरन्तर ब्रह्म में स्थित रहता है केवल वही आनंद ही आनन्द को प्राप्त करके परम-आनंद को प्राप्त होता है। (१९)
भगवद् गीता किञ्चिदधीता, गङ्गा जललव कणिकापीता।
सकृदपि येन मुरारि समर्चा, क्रियते तस्य यमेन न चर्चा॥ (२०)
भावार्थ : जिस व्यक्ति ने श्रीमद भगवद गीता का थोडा सा भी आचरण किया है, जिसने भक्ति रूपी गंगाजल का एक कण भर भी पिया है, या जिसने भगवान कृष्ण की एक बार भी स्थिर चित्त से पूजा की है, उस व्यक्ति की यमराज द्वारा कभी चर्चा नहीं होती है। (२०)
भावार्थ : बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु, बार-बार माँ के गर्भ में शयन कराने वाले इस संसार से पार जा पाना अत्यन्त कठिन है, हे कृष्ण मुरारी कृपा करके मेरी इस संसार से रक्षा करें। (२१)
भावार्थ : शरीर रूपी रथ की चिन्ता न करने वाले, पुण्य और पाप से रहित पथ पर स्थित होने वाले, योग में अपने चित्त को लगाने वाले ही बच्चे के समान आनंद में मग्न रहते हैं। (२२)
भावार्थ : तुम कौन हो? मैं कौन हूँ? कहाँ से मैं आया हूँ? कौन मेरी माता है? कौन मेरा पिता है? इस प्रकार के सभी सांसारिक भावों को एक स्वप्न के समान विचार करके त्याग दो। (२३)
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं, वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम्॥ (२४)
भावार्थ : तुम्हारे में, मेरे में और अन्य सभी में भगवान श्री विष्णु ही सर्वत्र व्याप्त हैं, तुम व्यर्थ में ही अपनी शक्ति क्षीण करते हो, यदि तुम शाश्वत विष्णु पद को प्राप्त करना चाहते हो तो सर्वत्र एक समान चित्त वाले हो जाओ। (२४)
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ, मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ।
भावार्थ : शत्रु, मित्र, पुत्र, बन्धु-बान्धवों से न प्रेम करो और न ही द्वेष करो, सभी में अपने स्वयं के रूप को ही देखो, सर्वत्र व्याप्त अज्ञान रूपी भेद को मिटा दो। (२५)
आत्मज्ञान विहीना मूढाः, ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः॥ (२६)
भावार्थ : कामनाओं, क्रोध, लोभ और मोह को त्यागकर स्वयं में स्थित होकर विचार करो कि मैं कौन हूँ? जो व्यक्ति मोह से ग्रसित होते हैं वह आत्म-ज्ञान को नहीं जान पाते हैं, ऎसे व्यक्ति बार-बार इस अज्ञान से आवृत संसार रूपी नरक में आ पड़ते हैं। (२६)
गेयं गीता नाम सहस्रं, ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्।
नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं, देयं दीनजनाय च वित्तम्॥ (२७)
भावार्थ : लक्ष्मीपति भगवान विष्णु के हजारों नामों को गाते हुए भगवान के सुन्दर रूप का निरन्तर ध्यान करो, सज्जनों की संगति में अपने चित्त को लगाओ और गरीबों की अपने धन से सेवा करो। (२७)
सुखतः क्रियते रामाभोगः, पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः।
यद्यपि लोके मरणं शरणं, तदपि न मुञ्चति पापाचरणम्॥ (२८)
भावार्थ : जो व्यक्ति अपने शरीर के लिये सुखों का भोग करते हैं उनके शरीर बाद में रोगों से ग्रसित हो जाते हैं, जबकि सभी जानते हैं कि इस संसार में सभी को मृत्यु की शरण जाना ही होता है फिर भी लोग पाप का आचरण करना नहीं छोड़ते हैं। (२८)
भावार्थ : मन में ऎसा विचार प्रतिदिन अवश्य करना चाहिए कि धन से कभी सुख की प्राप्ति नहीं होती है, इस सत्य को सभी जानते है कि धनवान से धनवान व्यक्ति भी अपने पुत्रों डरा करते हैं। (२९)
प्राणायामं प्रत्याहारं, नित्यानित्य विवेकविचारम्।
जाप्यसमेत समाधिविधानं, कुर्ववधानं महदवधानम्॥ (३०)
भावार्थ : प्राणायाम से, उचित आहार से, नित्य इस संसार की अनित्यता का विवेक पूर्वक विचार करो, प्रेम से प्रभु के नाम का जाप करते हुए, समाधि में रहकर, सभी कर्तव्यों का विधि-पूर्वक पालन करो। (३०)
गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः, संसारादचिराद्भव मुक्तः।
भावार्थ : गुरु के चरण कमलों के आश्रित हो जाओ और गुरु भक्त बनकर हमेशा के लिए इस संसार के आवागमन से मुक्त हो जाओ, ईश्वर के नियमानुसार मन सहित इन्द्रियों का निग्रह करके अपने हृदय में स्थित प्रभु के दर्शन करो। (३१)
भावार्थ : मोहग्रस्त व्यक्ति ही वेदों की श्रुतियों का अध्यन कर व्याकरण सहित कंठस्थ करते है, बुद्धिमान व्यक्ति गुरु को भगवान शंकर समझकर शिष्यता प्राप्त कर वेदों का सार ग्रहण करते हैं। (३२)
भजगोविन्दं भजगोविन्दं, गोविन्दं भजमूढमते।
नामस्मरणादन्यमुपायं, नहि पश्यामो भवतरणे॥ (३३)
भावार्थ : हे मोह से ग्रसित बुद्धि वालो! गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि भगवान के नाम का जाप और भगवान के स्मरण करने के अतिरिक्त इस भव-सागर से पार होने का अन्य कोई मार्ग नहीं है। (३३)
प्रश्न
***** कस्त्वं शिशो कस्य कुतोऽसि गन्ता, किं नाम ते त्वं कुत आगतोऽसि।
ऐतंमयोक्तम वद चार्भकत्वं, मत्प्रीतये प्रीतिविवर्धनोऽसि ॥१॥
भावार्थ : मेरी प्रीति को बढ़ाने वाले तुम कौन हो? किसके पुत्र हो? कहाँ जा रहे हो ? तुम्हारा नाम क्या है? कहाँ से आए हो? हे बालक, मेरी प्रसन्नता के लिए, मुझे यह सब बताओ ॥१॥
उत्तर
****** नाहं मनुष्यो न च देवयक्षौ, न ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः।
न ब्रम्हचारी न गृही वनस्थो, भिक्षुर्न चाहं निजबोधरूपः ॥२॥
भावार्थ : न मैं मनुष्य हूँ , न देवता अथवा यक्ष हूँ , न मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हूँ, न ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ या सन्यासी हूँ , मैं केवल आत्मज्ञान स्वरुप हूँ ॥२॥
निमित्तं मनश्चक्षुरादिप्रवृत्तौ, निरस्ताखिलोपाधिराकाशकल्पः।
रविर्लोक चेष्टानिमित्तं यथा यः, स नित्योपलब्धिस्वरुपोऽहमात्मा ॥३॥
भावार्थ : जिस प्रकार सूर्य इस संसार के सारे क्रिया - कलापों का कारण है, उसी प्रकार मन और चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों की चेष्टाओं का आधार परन्तु समस्त उपाधियों से आकाश के समान रहित, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥३॥
यमग्न्युष्णवन्नित्यबोधस्वरूपं, मनश्चक्षुरादीन्यबोधात्मकानि।
प्रवर्तन्त आश्रित्यनिष्कंपमेकं, स नित्योपलब्धिस्वरुपोऽहमात्मा ॥४॥
भावार्थ : जिसका अग्नि की उष्णता के समान अनवरत बोध होता है, जो स्वयं स्थिर रह कर अकेले ही मन, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों को कार्यशील बनाता है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥४॥
भावार्थ : जिस प्रकार मुख की छाया ही शीशे में दिखाई देती है, मुख के हटने पर कुछ भी दिखाई नहीं देता उसी प्रकार चेतना भी जीवरूपी छाया जैसे बुद्धि में प्रतिबिंबित होती है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥५॥
यथा दर्पणाभाव आभासहानो, मुखं विद्यते कल्पनाहीनमेकं।
तथा धीवियोगे निराभासको यः, स नित्योपलब्धिस्वरुपोऽहमात्मा ॥६॥
भावार्थ : जिस प्रकार शीशे के हटने पर छाया विलुप्त हो जाती है और अकल्पनीय मुख विद्यमान रहता है उसी प्रकार बुद्धि के हटने पर जीव रुपी प्रतिबिम्ब रहित चेतना विद्यमान रहती है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥६॥
मनश्चक्षुरादेविर्युक्तः स्वयं यो, मनश्चक्षुरादेर्मनश्चक्षुरादिः।
मनश्चक्षुरादेरगम्यस्वरूपः, स नित्योपलब्धिस्वरुपोऽहमात्मा ॥७॥
भावार्थ : मन, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों से रहित, मन, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों का भी मन और चक्षु, मन, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों के लिए अगम्य, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥७॥
य एको विभाति स्वतः शुद्धचेताः, प्रकाश स्वरूपोऽपि नानेव धीषु।
शरावोदकस्थो यथा भानुरेकः, स नित्योपलब्धिस्वरुपोऽहमात्मा ॥८॥
भावार्थ : जिस प्रकार एक सूर्य अनेक सरोवरों में अनेक रूपों में दिखाई देता है उसी प्रकार जो एक, स्वयं प्रकाशित, शुद्ध, चेतना स्वरुप और नाना बुद्धियों में प्रकाश स्वरुप है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥८॥
भावार्थ : जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश अनेक आँखों को एक साथ प्रकाशित करता है, उसी प्रकार जो अनेक बुद्धियों को एक साथ प्रकाशित करता है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥९॥
भावार्थ : जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में आँख अनेक प्रकार के रूपों में सूर्य के प्रकाश को ही देखती है, उसी प्रकार जिसके प्रकाश में आँखें एक(ब्रह्म) को देखती हैं, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥१०॥
यथा सूर्य एकोऽप्स्वनेकश्चलासु, स्थिरास्वप्यनन्यद्विभाव्यस्वरूपः।
चलासु प्रभिन्नासु धीष्वेवमेकः, स नित्योपलब्धिस्वरुपोऽहमात्मा ॥११॥
भावार्थ : जिस प्रकार स्वयं स्थिर होते हुए भी एक सूर्य चंचल जल में अनेक भागों में बँटा दिखाई देता है, लेकिन स्थिर जल में सभी बँटे हुए भाग एक सूर्य में मिल जाते हैं , उसी प्रकार जोएक होते हुए भी अनेक बुद्धियों में अनेक दिखाई देता है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥११॥
घनच्छन्न दृष्टिर्घनच्छन्नमर्कं, यथा निष्प्रभं मन्यते चातिमूढ़ः।
तथा बद्धवदभाति यो मूढ़दृष्टे:, स नित्योपलब्धिस्वरुपोऽहमात्मा ॥१२॥
भावार्थ : जिस प्रकार बादलों से रुकी हुई द्रष्टि के कारण अत्यंत मोहित व्यक्ति सूर्य को छिपा हुआ मानता है, उसी प्रकार जो विवेकहीन द्रष्टि से बंधा हुआ सा दिखाई देता है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥१२॥
समस्तेषु वस्तुष्वनुस्यूतमेकं, समस्तानि वस्तूनि यं न स्पृशन्ति।
वियद्वत्सदा शुद्धमच्छस्वरूपं, स नित्योप्लब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥१३॥
भावार्थ : जो समस्त वस्तुओं में आकाश के समान विद्यमान है, परन्तु जिसे समस्त वस्तुऎं स्पर्श नहीं कर सकती हैं, जो शुद्ध, सत्य स्वरुप है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥१३॥
उपाधौ यथा भेदता सन्मणीनां, तथा भेदता बुद्धिभेदेषु तेऽपि।
यथा चन्द्रिकाणाम् जले चंचलत्वं, तथा चंचलत्वं तवापीह विष्णो ॥१४॥
भावार्थ : जिस प्रकार मणियों में भेद उनके आकार-प्रकार के कारण होता है, वस्तुतः नहीं, उसी प्रकार आप में भेद बुद्धि की भिन्नता के कारण ही दिखाई देता है। जिस प्रकार जल की चंचलता के कारण अनेक चन्द्र प्रतिबिम्ब चलायमान दिखते हैं उसी प्रकार हे सर्वव्यापक प्रभु आपमें भी चंचलता प्रतीत होती है ॥१४॥